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पर्यावरण दिवस के संदर्भ में  – रमेश मुमुक्षु के शब्दों में (भाग -2)

पर्यावरण दिवस के संदर्भ में – रमेश मुमुक्षु के शब्दों में (भाग -2)

पर्यावरण की बात आते ही हिमालय और समस्त पर्वतीय क्षेत्रों के महत्व पर विचार करना जरूरी हो ही जाता है । सम्पूर्ण  हिमालय क्षेत्र भारत ही नही पृथ्वी के बड़े भूभाग अथवा बड़ी जनसंख्या का पोषक है। हिमालय से निकलने वाली नदियों से चिरकाल से मानव सभ्यताओं का  जन्म हुआ और उनके  विकास और विनाश की न रुकने वाला सिलसिला आज भी जारी है। मानव के जीवन में हिमालय की नदियों , उसके जंगल, हिमनद समेत सभी उसके जीवन के आधार है। ये सब तराई से लेकर उच्च हिमालय क्षेत्र जलवायु के वास्तविक  नियामक है।
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हिमालय की बर्फ़ीली श्रखलाओं जिनमे हिमनद नदी के उद्गम क्षेत्र माने जाते है , जहां से गंगा ,यमुना और ब्रह्मपुत्र सहित कितनी ही अन्य नदियों निकालकर नदी प्रणाली का सृजन करती है।
इसके अतिरिक्त उच्च गैर हिमानी पर्वतीय श्रखलाओं से भी नदियों निकलती है। ये पर्वतीय क्षेत्र वनों विशेषकर चौड़ी पत्ती वाले वनों से आच्छादित होते है। विभिन्न प्रकार की चट्टानों और वनप्रदेश नदियों को पैदा करने में सहायक सिद्ध होते है।
लेकिन उपरोक्त वर्णित सभी प्राकृतिक प्रदेशों पर भारी संकट बढ़ता जा रहा है। ये संकट अभी हाल फिलहाल से नही बल्कि लम्बे समय से बढ़ता गया है। इसका मुख्य कारण है, मानव की विकास की अवधारणा जो इनके संरक्षण के महत्व को बिना समझे पनपती आईं है। तेजी से विकास इसके विनाश का कारण है। मानव इतना आगे आगया है कि अब इन सब की क्षतिपूर्ति प्रायः असंभव ही लगती है। जैसा हम सब को ज्ञात ही है कि हिमालय का उद्विकास जारी है। इसलिए बहुत से भाग अभी भी भंगुर अवस्था में ही है।
अब प्रश्न उठता है कि हमको आगे आने वाली पीढ़ियों को अगर जीवन के ये महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटकों को अक्षुण्ण रखना है ,तो इनको संरक्षित करने  के लिए सभी पुरातन और आधुनिक तरीक वे ज्ञान को एक साथ मिशन की तरह अपनाना ही पड़ेगा। इसके लिए भले उच्च हिमालय एवम अन्य पर्वतीय क्षेत्रों को कुछ समय के लिए मानव गतिविधियों से दूर करना पड़े, भले ही वो धार्मिक यात्राएं ही क्यों न हो। एक बात नही भूलनी चाहिए कि ये सब इनका अस्तित्व  मानव के प्रादुर्भाव से से पूर्व ही गया था। ऐसा नही की प्राकृतिक परिवेश में परिवर्तन नही आते। प्रकृति की संरचना में परिवर्तन एक शुद्ध रूप से प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो सतत रूप से विकशित और परिवर्तित होती रहती है। लेकिन मानव के समस्त विकास के मॉडल और अवधारणा में समग्रता की दृष्टि न होने से तुरंत विकास की आदत ने  प्रकृति की चाल को विकृत कर दिया , जिसका खामियाजा बदलते मौसम के रूप में मानव समेत सभी जीवों को झेलना पड़ रहा है।
विश्व के समस्त बर्फ  से ढके भूभाग तेजी से विलुप्त होने के कगार पर आते जा रहे है। ये मानव समेत सभी जीवों अथवा समस्त पर्यावरण के के लिए घातक होता जा रहा है।
सबसे बड़ी विवशता एवं विडंबना है कि मानव की आज तक की तरक्की और सभी उपलब्धि भी इस बिगड़ती स्थिति को बचा पाने में सफल नही हो पा रही है। मानव का लालच और वसुंधरा को मात्र भोग की वस्तु के रूप में बेतहाशा उपभोग इन सब विनाश का कारण  आज स्वीकारना ही होगा।
अब सब कुछ आपस के विवाद को दरकिनार कर सबसे पहले मानव अस्तिव से पहले सम्पूर्ण पर्यावरण संरक्षण और उसके विनाश की गति को नियंत्रण करने का भगीरथ प्रयास और अपने अस्तित्व को सर्वमूल नष्ट करने वाले हथियार और युद्ध की सभी संभावनाओं को कैसे कम कर सकें, ये पूरी दुनियां को सोचना है। आज समय गया है कि इन बिंदुओं पर विचार ही नही बल्कि एक मिशन मोड पर आना ही होगा। वरना प्राकृतिक क्षति को पुनः सृजित नही किया जा सकता है। इस सत्य को अपनी संवेदना में  ढाल सकें तो शायद विनाश की गति को धीमी करने का प्रयास अभी भी हो सकता है। जलवायु परिवर्तन को सहज ज्ञान से भी अब समझा जा सकता है। अगर प्राकृतिक संसाधन विकास के कारण कम होते गए, तो वो विकास नही विनाश ही होगा।
इस विचार को पुष्ट करना ही होगा।
रमेश मुमुक्षु

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